August 3, 2026

ghatikigoonj

newsindia

16 करोड़ की परियोजना में क्या केवल डिजाइनर को ब्लैकलिस्ट कर सभी अपनी जिम्मेदारी से बच जाएंगे और अपनी नय्या पार लगा लेंगे ?

देहरादून। प्रेमनगर स्थित नंदा की चौकी पुल परियोजना, जिस पर लगभग 16 करोड़ रुपये की सार्वजनिक धनराशि खर्च की गई, उसके उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद अप्रोच रोड धंसने की घटना ने पूरे निर्माण तंत्र की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।

समाचारों के अनुसार जांच रिपोर्ट में डिजाइन संबंधी कमियों का उल्लेख किया गया है तथा डिजाइन कंसल्टेंट की जिम्मेदारी तय किए जाने की बात सामने आई है। यदि आगे की कार्रवाई केवल डिजाइनर या डिजाइन कंसल्टेंट को ब्लैकलिस्ट करने तक सीमित रहती है, तो एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठेगा—क्या इससे परियोजना से जुड़े अन्य जिम्मेदार पक्ष स्वतः उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाएंगे?

किसी भी पुल परियोजना में केवल डिजाइन ही पर्याप्त नहीं होता। डिजाइन की समीक्षा एवं स्वीकृति, साइट की वास्तविक परिस्थितियों का परीक्षण, निर्माण की गुणवत्ता, सामग्री की जांच, चरणबद्ध निरीक्षण, गुणवत्ता नियंत्रण, Measurement Book का सत्यापन, Running Bills एवं Final Bill का प्रमाणीकरण और कार्य पूर्णता प्रमाण-पत्र जारी करने तक अनेक स्तरों पर सरकारी अभियंता एवं अधिकारी अपनी तकनीकी और प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाते हैं और समय समय पर निर्माण कार्य का निरक्षण करते है

यदि वास्तव में डिजाइन में गंभीर कमी थी, तो क्या संबंधित सरकारी अभियंताओं ने डिजाइन, DPR, GAD तथा निर्माण ड्रॉइंग का परीक्षण किए बिना ही स्वीकृति प्रदान कर दी ? यदि परीक्षण किया गया था, तो उस समय कोई आपत्ति क्यों दर्ज नहीं की गई ? और यदि परीक्षण नहीं किया गया, तो क्या यह स्वयं प्रशासनिक लापरवाही का विषय नहीं है ? अगर समय रहते सरकारी अभियंता सही तरीके से परिक्षण कर लेते और ईमानदारी से अपनी जिम्मेदारी निभाते तो ये परिणाम ना होता.

इसी प्रकार यदि जांच में यह सामने आता है कि पुल की मुख्य संरचना, Foundation और Abutment सुरक्षित हैं तथा केवल अप्रोच रोड प्रभावित हुई है, तो तकनीकी दृष्टि से यह भी जांच का विषय होगा कि कहीं निर्माण गुणवत्ता, Compaction, Earth Filling, Drainage, Retaining Structure, Transition Zone, गुणवत्ता नियंत्रण या कार्य निष्पादन में कोई कमी तो नहीं रही।

यह भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि निर्माण के दौरान किए गए Compaction Test, Field Density Test (FDT), Soil Investigation, Quality Control Reports, निरीक्षण रजिस्टर, Third Party Inspection, Site Order Book तथा अन्य परीक्षण वास्तव में निर्धारित मानकों के अनुरूप किए गए थे या नहीं।

यदि सभी परीक्षण संतोषजनक थे, तो फिर उद्घाटन के कुछ दिनों बाद ऐसी स्थिति क्यों उत्पन्न हुई? और यदि परीक्षणों या निरीक्षण में कमी थी, तो सार्वजनिक धन से किए गए करोड़ों रुपये के भुगतान किस आधार पर स्वीकृत किए गए?

जनहित में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि जांच केवल डिजाइन तक सीमित न रहकर पूरी Decision Chain की निष्पक्ष जांच करे। इसमें DPR तैयार करने वाली एजेंसी, डिजाइन कंसल्टेंट, निर्माण एजेंसी, सुपरविजन कंसल्टेंट, गुणवत्ता नियंत्रण इकाई, संबंधित अभियंता, निरीक्षण करने वाले अधिकारी तथा भुगतान स्वीकृत करने वाले सक्षम अधिकारियों—सभी की भूमिका का वस्तुनिष्ठ परीक्षण किया जाना चाहिए।

अंततः वास्तविक जिम्मेदारी तकनीकी साक्ष्यों और जांच रिपोर्ट के आधार पर ही तय होनी चाहिए। यदि किसी स्तर पर डिजाइन, निर्माण, पर्यवेक्षण, गुणवत्ता नियंत्रण या प्रशासनिक निर्णय में चूक पाई जाती है, तो कार्रवाई भी उसी अनुपात में सभी जिम्मेदार पक्षों पर होनी चाहिए। केवल एक पक्ष पर कार्रवाई और अन्य संभावित जिम्मेदारियों की अनदेखी, यदि ऐसा होता है, तो जनहित और जवाबदेही—दोनों पर गंभीर प्रश्न खड़े करेगी।

यह प्रश्न केवल एक पुल का नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन, इंजीनियरिंग मानकों और सरकारी जवाबदेही का है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि 16 करोड़ रुपये की परियोजना में हुई तकनीकी विफलता के लिए वास्तविक जिम्मेदार कौन है और उसके विरुद्ध क्या कार्रवाई की जाएगी।