September 21, 2026

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16 करोड़ मे नंदा की चौकी में पहले से बने ब्रिज से संबंधित कार्य या 16 करोड़ मे ही रानीपोखरी में नया 285 मीटर लंबा ब्रिज बना ? नंदा की चौकी के 16 करोड़ के ब्रिज मे सरकारी पैसा का सदुपयोग या दुरूपयोग

क्या नंदा की चौकी परियोजना में जरूरत से अधिक खर्च हुआ ? क्या नदी किनारे की Retaining/Protection Wall से Law College या दूसरी ओर की संपत्तियों को कोई अप्रत्यक्ष लाभ मिला ? सवाल उठ रहे हैं—खामोशी किस तरफ इशारा करती है?

नंदा की चौकी–उत्तरांचल विश्वविद्यालय के पास टोंस नदी पर लगभग ₹16 करोड़ की परियोजना को लेकर अब तकनीकी, वित्तीय और प्रशासनिक सवाल उठ रहे हैं। एक तरफ नंदा की चौकी में पहले से निर्मित ब्रिज से संबंधित कार्य बताए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उपलब्ध जानकारी के अनुसार वर्ष 2022 में रानी पोखरी में लगभग 285 मीटर लंबा PSC Girder Bridge करीब ₹16.1855 करोड़ की reported sanctioned cost में तैयार हुआ था। दोनों परियोजनाएं PWD से संबंधित हैं।

सवाल यह है कि लगभग समान राशि में एक ओर नया और लगभग 285 मीटर लंबा पुल तैयार हुआ, जबकि दूसरी ओर पहले से निर्मित ब्रिज से संबंधित कार्यों के लिए लगभग ₹16 करोड़ की राशि क्यों लगी ?

लेकिन यही अंतर अब स्वतंत्र तकनीकी एवं वित्तीय जांच की मांग को जन्म देता है।

लगभग 10×110 मीटर लंबी दोनों ओर की Retaining/Protection Wall पर सवाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल टोंस नदी के दोनों किनारों पर बनाई गई बताई जा रही लगभग 10 x 110 मीटर लंबी Retaining/Protection Wall, River Diversion, River Training, Downstream Protection Works तथा बाद में जोड़े गए अन्य कार्यों को लेकर हैं।
जांच का विषय यह होना चाहिए कि—
– क्या इन सभी कार्यों की वास्तविक तकनीकी आवश्यकता थी ?
– क्या Original DPR में इनका प्रावधान था ?
– यदि नहीं था तो बाद में इन्हें किसके प्रस्ताव पर जोड़ा गया ?
– किस अधिकारी/प्राधिकरण ने इसकी तकनीकी एवं वित्तीय स्वीकृति दी?
– इन अतिरिक्त कार्यों से परियोजना की लागत कितनी बढ़ी ?
– क्या नदी क्षेत्र की भूमि का उपयोग इन Walls के निर्माण में हुआ ?
क्या Law College या दूसरी ओर की संपत्तियों को अप्रत्यक्ष लाभ मिला ?

यह भी जांच का गंभीर विषय है कि नदी क्षेत्र में दोनों तरफ बनाई गई 10×110 mtr की Retaining/Protection Wall से Law College अथवा नदी के दूसरी ओर स्थित किसी भूमि/ भवन को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ मिला या नहीं।

जांच में यह देखा जाना चाहिए कि उस समय नदी संरक्षण एवं River Training से संबंधित कार्यों की जिम्मेदारी किन विभागों को दी गई थी और नंदा की चौकी परियोजना में उन्हीं प्रकृति के कार्यों को किस आधार पर शामिल किया गया।
विशेष रूप से Office Circular No.356/79 Yata-Na-2/2024 dated 14.03.2024 की परियोजना से तुलना की जानी चाहिए।
यदि संबंधित श्रेणी का River Training/ Upstream Protection Work Irrigation Department के कार्यक्षेत्र में था, तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि वही कार्य PWD परियोजना में किस सक्षम प्राधिकारी की अनुमति/ स्वीकृति से शामिल और निष्पादित हुआ।
यदि ये कार्य वास्तव में सार्वजनिक सुरक्षा, नदी संरक्षण अथवा पुल की संरचनात्मक सुरक्षा के लिए आवश्यक थे, तो DPR, Design, Technical Sanction, Site Plan, Land Records, MB, Measurement, Bills और Payment Records से इसका स्पष्ट तकनीकी औचित्य सामने आना चाहिए।

River Diversion पर भी गंभीर सवाल

परियोजना में Himalayan Construction द्वारा River Diversion Works किए जाने की बात सामने आती है।
उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार PWD MB No. 950-L, Pages 115–116 तथा Item Nos. 4.06 और 4.07 में River Diversion Works की माप दर्ज बताए जाते हैं।

लेकिन केवल MB में दर्ज मात्रा को वास्तविक भौतिक निष्पादन का अंतिम प्रमाण मानना पर्याप्त नहीं है।
अर्थात रिकॉर्ड में दर्ज मात्रा और मौके पर वास्तव में किए गए कार्य का भौतिक एवं दस्तावेजी reconciliation कराया जाए।

28 जुलाई 2026 की क्षति ने सवाल और गंभीर किए

28.07.2026 को सामने आई damage/subsidence की घटना के बाद यह भी निर्धारित किया जाना जरूरी है कि क्षति का वास्तविक कारण क्या था।
क्या इसका संबंध—
River Diversion और Temporary River Management का दायित्व ठेकेदार के अनुबंध में था, तो Himalayan Construction द्वारा किए गए कार्यों का Agreement, BOQ, Specifications, Method Statement और Contract Conditions के अनुसार अनुपालन भी जांच के दायरे में आना चाहिए।
रानी पोखरी बनाम नंदा की चौकी—तकनीकी तुलना क्यों नहीं ?

सवाल सीधा है—
लगभग ₹16 करोड़ में रानी पोखरी में नया और लगभग 285 मीटर लंबा पुल तैयार हुआ, तो नंदा की चौकी में पहले से निर्मित ब्रिज से संबंधित कार्यों पर लगभग इतनी ही राशि क्यों खर्च हुई ?

जनता के सामने आने चाहिए ये 10 बड़े सवाल
1. लगभग ₹16 करोड़ की नंदा की चौकी परियोजना में वास्तव में कौन-कौन से कार्य किए गए ?
2. Original DPR और Final Executed Scope में कितना अंतर है ?
3. दोनों ओर की लगभग 110 मीटर लंबी Retaining/Protection Wall की वास्तविक तकनीकी आवश्यकता क्या थी ?
4. क्या इन Walls के लिए नदी क्षेत्र की भूमि का उपयोग हुआ और यदि हां, तो किस स्वीकृति के आधार पर ?
5. क्या इन कार्यों से Law College या दूसरी ओर स्थित किसी भूमि/भवन को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष लाभ मिला ?
6. River Diversion में वास्तविक भौतिक कार्य कितना हुआ और MB में कितना दर्ज किया गया ?
7. Himalayan Construction की River Diversion एवं Temporary River Management संबंधी contractual responsibility क्या थी और उसका अनुपालन हुआ या नहीं ?
8. 28.07.2026 की damage/subsidence का वास्तविक तकनीकी कारण क्या था ?
9. लगभग ₹16 करोड़ में Original Bridge-related Works और बाद में जोड़े गए River/Protection Works का अलग-अलग वित्तीय हिस्सा कितना है ?
10. रानी पोखरी के लगभग 285 मीटर PSC Girder Bridge की लगभग ₹16.1855 करोड़ की reported sanctioned cost और नंदा की चौकी की लगभग ₹16 करोड़ की परियोजना के बीच वास्तविक technical और component-wise cost difference कितना है ?

अब मांग है स्वतंत्र High-Level Inquiry की पूरे मामले की स्वतंत्र High-Level Technical, Financial एवं Administrative Inquiry कराई जाए तथा जांच समिति में ऐसे अधिकारियों/विशेषज्ञों को शामिल किया जाए जो परियोजना से संबंधित स्वीकृतियों की जांच सार्वजनिक जांच के दायरे में लाई जाए।
सवाल किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि यह पता लगाने का है कि लगभग ₹16 करोड़ की सार्वजनिक धनराशि वास्तव में किस काम पर,किस तकनीकी आवश्यकता के आधार पर और किस प्रक्रिया के तहत खर्च हुई।
क्या सरकारी धन के संभावित दुरुपयोग की स्वतंत्र जांच नहीं होनी चाहिए ?
सवाल उठ रहे हैं—यदि सब कुछ नियमानुसार है, तो पूरी Cost Chain और Technical Justification सार्वजनिक जांच के सामने लाने में संकोच क्यों ?
फिर सब खामोश क्यों ?





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